माननीय हाईकोर्ट ने विगत दिनों अपने फैसले मे मूर्ति विसर्जन को नदियों मे विसर्जित करने पर रोक लगा दी है . ठीक है , इन मूर्तियों मे इस्तेमाल होने वाले पदार्थों से इन पावन नदियों मे प्रदूषण होता है ,कुछ अन्य प्रगतिशील / आधुनिक लोगों को और आगे आना चाहिए और दीपावली जैसे त्योहारों को भी प्रदूषण के कारण प्रतिबंधित करवा देना चाहिए.
लेकिन इन कर्तव्यनिष्ठ लोगों को इन नदियों मे ३६५ दिन गिरने वाले नाले नहीं दिखते ,जो हमारे अनियोजित और कुकुरमुत्ते जैसे फैलते शहरो के मल मूत्र व अन्य अपशिष्टो को नदियों मे गिराते हैं,
कारखाने बिना शोधित ,भारी धातुओं के जहरीले कणों से भरे प्रदूषित पानी को नदियों, भूमिगत स्रोतों मे निस्तारित कर रहे है ,क्या इन पर भी नहीं रोक लगनी चाहिए?
अगर प्रदूषण के पूरे समुच्चय को लिया जाये तो आधुनिक ऐशोआराम के प्रतीक- जेट वायुयान, प्रति उडान कितने ही टन कालिख वायुमंडल मे निस्तारित करते हैं. ठंडी आबोहवा कमरे में लाने वाले एयर कंडीशनर तो पता नहीं कब गर्मी ,प्रदूषण और बिजली की खपत के दैत्य बन चुकें हैं .
आधुनिक जीवन के जितने भी यंत्र -प्रपंच हमनें पाश्चात्य देशों से आयत (या नक़ल) किये हैं ,वे कोई न कोई रूप मे हमारे जीवन मे प्रदूषण की जटिलता पैदा कर रहे हैं ,चाहे वह कारें हों ,मोबाइल टावर हों ,बिजलीघर हों ,बांध हों ,यंहां तक निरामिष भोजन भी प्रदूषण पैदा करता है .
क्या इनको भी प्रतिबंधित कर दिया जाये ?
वस्तुतः हजारों वर्षों से लोकमानस से जुड़े इन त्योहरों का प्रदूषण में अपेक्षा कृत लेशमात्र का ही योगदान है , लेकिन प्रदूषण के नाम पर जनभावनाओं से खिलवाड़ किया जा रहा है. अगर सच्चाई और ईमानदारी पूर्वक इन सांस्कृतिक विरासतों का सम्मान का विचार किया जाये तो अन्य तर्क पूर्ण तरीके भी हैं .जैसे बायो ग्रिड्बल एवम प्राचीन समय मे प्रचिलित सामग्री से बनी मूर्तियों के विसर्जनं के लिए दिशा निर्देश जारी किये जा सकते हैं .लेकिन इन उपाय के साथ साथ हमें आधुनिक जीवन शैली के साथ उत्पन्न समस्यों के साथ भी नजरें इनायत करने की भी अति आवश्यकता है .
वास्तव मे आधुनिक ज्ञान, विज्ञान और जीवनशैली के हम सौतेले अभिवावक हैं वास्तविक तो उन्हें अविष्कृत करने वाले हैं ,इसीलिए शायद हम इनकी वास्तविक अच्छाई और बुराई से भलीभांति परिचित नहीं हो पा रहें हैं ,हम बस इसे अधाधुंध अपनाये जा रहें हैं .
लेकिन इन कर्तव्यनिष्ठ लोगों को इन नदियों मे ३६५ दिन गिरने वाले नाले नहीं दिखते ,जो हमारे अनियोजित और कुकुरमुत्ते जैसे फैलते शहरो के मल मूत्र व अन्य अपशिष्टो को नदियों मे गिराते हैं,
कारखाने बिना शोधित ,भारी धातुओं के जहरीले कणों से भरे प्रदूषित पानी को नदियों, भूमिगत स्रोतों मे निस्तारित कर रहे है ,क्या इन पर भी नहीं रोक लगनी चाहिए?
अगर प्रदूषण के पूरे समुच्चय को लिया जाये तो आधुनिक ऐशोआराम के प्रतीक- जेट वायुयान, प्रति उडान कितने ही टन कालिख वायुमंडल मे निस्तारित करते हैं. ठंडी आबोहवा कमरे में लाने वाले एयर कंडीशनर तो पता नहीं कब गर्मी ,प्रदूषण और बिजली की खपत के दैत्य बन चुकें हैं .
आधुनिक जीवन के जितने भी यंत्र -प्रपंच हमनें पाश्चात्य देशों से आयत (या नक़ल) किये हैं ,वे कोई न कोई रूप मे हमारे जीवन मे प्रदूषण की जटिलता पैदा कर रहे हैं ,चाहे वह कारें हों ,मोबाइल टावर हों ,बिजलीघर हों ,बांध हों ,यंहां तक निरामिष भोजन भी प्रदूषण पैदा करता है .
क्या इनको भी प्रतिबंधित कर दिया जाये ?
वस्तुतः हजारों वर्षों से लोकमानस से जुड़े इन त्योहरों का प्रदूषण में अपेक्षा कृत लेशमात्र का ही योगदान है , लेकिन प्रदूषण के नाम पर जनभावनाओं से खिलवाड़ किया जा रहा है. अगर सच्चाई और ईमानदारी पूर्वक इन सांस्कृतिक विरासतों का सम्मान का विचार किया जाये तो अन्य तर्क पूर्ण तरीके भी हैं .जैसे बायो ग्रिड्बल एवम प्राचीन समय मे प्रचिलित सामग्री से बनी मूर्तियों के विसर्जनं के लिए दिशा निर्देश जारी किये जा सकते हैं .लेकिन इन उपाय के साथ साथ हमें आधुनिक जीवन शैली के साथ उत्पन्न समस्यों के साथ भी नजरें इनायत करने की भी अति आवश्यकता है .
वास्तव मे आधुनिक ज्ञान, विज्ञान और जीवनशैली के हम सौतेले अभिवावक हैं वास्तविक तो उन्हें अविष्कृत करने वाले हैं ,इसीलिए शायद हम इनकी वास्तविक अच्छाई और बुराई से भलीभांति परिचित नहीं हो पा रहें हैं ,हम बस इसे अधाधुंध अपनाये जा रहें हैं .